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नौकरशाही के हवाले करने की बजाय 6 माह के लिए पंचायतों के कार्यकाल का विस्तार किया जाए-भाकपा माले

"भीषण मानवीय त्रासदी से मिलजुलकर निपटने की बजाए जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति भाजपा-जदयू सरकार का गैरलोकतांत्रिक व असिहष्णु रवैया और उनके ऊपर नौकरशाहों का बढ़ता दबदबा बनाना है,जो चिंताजनक है"

बेतिया, मोहन सिंह

भाकपा माले राज्य कमिटी सदस्य सुनील कुमार यादव ने बयान जारी कर कहा कि कोरोना महामारी के कारण पंचायत चुनाव समय से नहीं हो सका है, पर नितीश सरकार पंचायतों के कार्यकाल को 6 माह बढाने की बजाय नौकरशाही के हवाले करने पर तुली हुईं हैं, जो इस तरह का फैसला पूरी तरह से गलत व अलोकतांत्रिक है, जनतंत्र का गलांघोटना है,
उन्होंने कहा कि पंचायतों के विभिन्न जनप्रतिनिधि जनता से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं, इसलिए हमारी मांग है कि कोविड से राहत बचाव अभियान में उनके अनुभवों का इस्तेमाल किया जाए. और पंचायत चुनाव को स्थगित करके 6 माह तक के लिए उसके कार्यकाल में बढ़ोतरी करना ही अभी सबसे सटीक कदम होगा.

आगे कहा कि जिस तरह से कोविड-19 में स्वास्थ्य व्यवस्था की घोर असफलता से पैदा हुई भीषण मानवीय त्रासदी सामने आई हैं, इससे मिलजुलकर निपटने की योजना पर काम करना चाहिए, मगर जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति भाजपा-जदयू सरकार का गैरलोकतांत्रिक व असिहष्णु रवैया और उनके ऊपर नौकरशाहों का बढ़ता दबदबा बेहद चिंताजनक है. ‘आपदा में अवसर’ तलाशने वाली सरकार आज सहभगिता को खत्म कर पूरी वैधानिक व्यवस्था को ही अंदर से खोखला कर देने पर तुले हैं. दुर्भाग्य यह है कि इसकी शुरुआत विधानसभा के अंदर से ही हुई थी जब विपक्ष के विधायकों की बेरहमी से पिटाई हुई थी. उक्त कांड ने विधायकों की प्रतिष्ठा को धूमिल किया. सरकार ने बाजाप्ता अस्पतालों व सामुदायिक किचेन के निरीक्षण से भी उन्हें मना कर दिया है. जबकि हमारी पार्टी के सारे विधायक पहले ही दिन से कोविड पीड़ितों की सेवा में जी-जान से जुटे हुए हैं और सरकार से बारम्बार सहयोग की अपील की है ताकि हम सब इस त्रासदी का सफलतापूर्वक सामना कर सकें. लेकिन सरकार की मंशा कुछ और ही दिख रही है. माले नेता ने कहा कि हर प्रस्थिति में लोकतंत्र के लिए आवाज उठाना पड़ता है, आज भी उठाया जा रहा है

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